खेत, खलिहान और किसान
हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण, जल संरक्षण और वन संरक्षण में भी विशेष योग्यता हासिल की है | अनेक उपायों से वे इनकी हिफाज़त करते थे | जंगलों में रहने वाले आदिवासी प्रसव के दौरान एक विशेष पेड़ की छाल का प्रयोग करते थे | छाल निकलने से पहले उस पेड़ को दाल, चावल का न्योता देते फिर उसकी पूजा करते, बाद में मंत्र पढने के साथ ही कुल्हाड़ी के एक बार में जितनी चाल निकल जाये उतने का ही दावा के तौर पर इस्तेमाल करते | लेकिन आज सरकारों का उद्देश्य जंगल की हिफाज़त करना नहीं बल्कि उसे बेचना है |
खेती से जुड़े फैसले भी एसी कमरों में बैठे लोग करते हैं जिनका खेती किसानी से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं होता | अगर यही योजनायें किसानो के बीच बरगद के पढ़ के नीचे बैठकर बनाई जाएँ जिसमे पारंपरिक कृषि और स्थनीय तकनीक के साथ ही ग्रामीण स्तर पर चारा पैदा करने और मवेशियों की स्थानीय नस्लें पैदा करने की सार्थक विचार विमर्श कर ठोस पहल की की जाये तो किसान और मजदूर आत्महत्या करने पर मजबूर नहीं होंगे |
