रविवार, 2 नवंबर 2014

हाशिए पर डालने की नीति उचित नहीं


हाशिए पर डालने की नीति उचित नहीं 
सरदार पटेल और इंदिरा गांधी, दोनों ही देश की बड़ी शख्सियतें

भारतीय इतिहास में 31 अक्टूबर की तिथि दो कारणों से महत्वपूर्ण हो गया है. एक तो इसी दिन देश के प्रथम उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती है और दूसरे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि भी है. सरदार पटेल की गिनती उन राष्ट्र निर्माताओं में होती है जिन्होंने भारत को एक सूत्र में पिरोया। यह पटेल ही थे, जिन्होंने आजादी के बाद रियासतों के रूप में बिखरे भारत को एक एकीकृत राष्ट्र के रूप में उभारा। आजाद भारत की पहली सरकार में गृहमंत्री और साथ ही उप प्रधानमंत्री रहते हुए पटेल ने जो कार्य किए वे भारत की एकता, अखंडता, संप्रभुता और अस्मिता के लिहाज से हमेशा सर्वोपरि माने जाएंगे। एक समय महात्मा गांधी के साथ पटेल, नेहरू और राजेंद्र प्रसाद सरीखे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को एक ही श्रेणी में रखा जाता था, लेकिन धीरे-धीरे नेहरू का वर्चस्व बढ़ने के साथ ही पटेल और अन्य नेताओं के नाम हाशिये पर चले गए। तत्कालीन सत्तारूढ़  कांग्रेस ने इसकी परवाह भी नहीं की। उसके लिए सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर नेहरू और गांधी परिवार के लोग ही देश के लिए महत्वपूर्ण रह गए. भाजपा सरकार पटेल को याद कर उनकी विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है. प्रधानमंत्री मोदी एक तीर से दो निशाने साधते हुए देश की आम जनता और साथ ही कांग्रेस को यह बताना चाहते हैं कि यह देश केवल नेहरू खानदान के त्याग की वजह से नहीं बना।

1984 में इसी दिन इंदिरा गांधी की हत्या हो जाने के बाद से कांग्रेस ने पटेल की जयंती की तुलना में पूर्व प्रधानमंत्री की पुण्यतिथि को ज्यादा महत्व दिया। यह सही है कि एक प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता, लेकिन सरदार पटेल की प्रेरणा को भी हाशिये पर नहीं डाला जा सकता। जो गलती पूर्ववर्ती सरकार और कांग्रेस ने की थी, वही गलती इंदिरा गांधी को भुला कर वर्तमान भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार ने किया. यह कहीं से भी आदर्श नहीं है. यह तो माना जा सकता है कि इंदिरा जी कांग्रेस पार्टी की नेता थी. शायद इसीलिये मोदी ने इंदिरा गांधी को राष्‍ट्रीय कार्यक्रम में शामिल नहीं किया. ऐसा नहीं है कि इस नई परम्परा से देश का जनमानस दुखी नहीं हुआ. कितना हुआ इसकी गणना करना व्यर्थ ही है. 31 अक्टूबर देश के इतिहास का दिन है. मोदी ने पटेल की जन्म तिथि गौरव के साथ मनाई गई. बेहद अच्छा लगा. इससे पूर्व सरदार पटेल की जयंती इतने गरिमा के साथ नहीं मनाई गई. इसके साथ हो देश की अन्य नेता इंदिरा गांधी को सरकारी तौर पर पुण्य तिथि मनाने से परहेज किया गया. ऐसा क्यों किया गया इसका सटीक जबाब जो भी सरकार के नुमाइंदे या भाजपा दे, लेकिन गलती को तो गलती ही माननी पड़ेगी. यह यथार्थ है कि समय और देशकाल के अनुसार दोनों ही नेताओं ने देश का विकास करने के साथ जनमानस में प्रतिष्ठा हासिल की. दोनों ही नेता कांग्रेस के थे. सम्मान दोनों को ही बराबर दिया जाना चाहिए था.

इसमें दो राय नहीं होनी चाहिए कि इंदिरा गांधी देश की महान शख्सियतों में से एक  थी. 1971 का युद्ध हो या ब्ल्यू स्तर ओप्रेशन देश की एकता और अखण्डता के सर्व श्रेष्ठ उदाहण है. 1971 के युद्ध में जब बांग्ला देश बनाया गया तो महान नेता अटलविहारी जी ने संसद में खुले दिमाग से तारीफ की थी. जबकि वाजपेयी जी विपक्ष में थे. देश को विश्व में मजबूत स्थान दिलाने में इंदिरा गांधी का अमूल्य योगदान हैं. देश को विश्व स्तर पर स्थापित किया. इंदिरा गांधी को कभी झुटलाया, बिसराया नहीं जा सकता.पटेल भी कॉंग्रेस के नेता थे, और इंदिरा भी. फिर यह भेदभाव क्यों किया गया. मोदी ने पटेल को गुजरात का होने के नाते तजरीह दी. क्या इस तरह की विचारधारा रखना देश के हित में उचित है? इस तरह तो महान नेता प्रदेश के हिसाब से बांट लिये जायेंगे. फिर देश की अखंडता का अर्थ रह क्या जाएगा?

इंदिरा गांधी ने बैंकों, खदानों, तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया, पूर्व महाराजाओं की पदवियां और सुविधाएं ख़त्म कर दीं और 1971 का आम चुनाव 'ग़रीबी हटाओ' के जोशीले नारे के साथ जीत लिया. चुनाव जनवरी में हुए थे और इसी साल के आख़िरी महीने में इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान पर भारतीय सेना की विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके बाद एक नए स्वतंत्र राष्ट्र बांग्लादेश का जन्म हुआ. मध्यवर्ग के एक ख़ास धड़े में इंदिरा गांधी बेहद लोकप्रिय बनी रहीं. तब अंग्रेज़ी भाषा की पत्रिकाओं के सर्वेक्षणों में उन्हें आमतौर पर 'भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री' बताया गया. यह समर्थन मुख्यतः 1971 की जंग में उनके रूख़ की वजह से था जो 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध के दौरान उनके पिता के दुखद नेतृत्व की तुलना में एकदम अलग था.
समाजवादी उनके ग़रीब-समर्थक भाषणों के चलते उनसे सहानुभूति रखते थे. लेकिन, दूसरी तरफ़ बहुत से ऐसे भारतीय भी हैं जो कि उनकी विरासत के प्रति उदासीन हैं. वह लोग इंदिरा गांधी की 'तानाशाही' प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं जो उनके चमत्कारिक साल- 1971, के बाद सामने आईं.

'तानाशाह'
उस वक़्त उन्होंने 'समर्पित अफ़सरशाही' और 'समर्पित न्यायपालिका' की मांग की. वह इससे पहले, स्वायत्त रही इन संस्थाओं को सत्ताधारी नेताओं की इच्छा और सनक के हिसाब से चलाना चाहती थीं. इसका देश और देश की प्रगति पर विपरीत असर दिखाना शुरू हो गया था. लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण भी होने लगा था. हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार इस कदर बढ़ना शुरू हो गया कि जनता बेचैन हो उठी. 1974 में जाने-माने गांधीवादी जयप्रकाश नारायण ने सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन चलाया. जून 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री को चुनावी गड़बड़ी का दोषी पाया. इंदिरा गांधी ने राजनीतिक और न्यायिक स्तर पर उठी इन चुनौतियों का जवाब आपातकाल लगाकर दिया. प्रेस सेंसर लगा दिया गया और विपक्ष के सैकड़ों नेताओं को जेल में डाल दिया गया.

आपातकाल जनवरी 1977 तक जारी रहा. मार्च में हुए चुनाव में चार अलग-अलग दलों से बने गठबंधन जनता पार्टी ने कांग्रेस को उखाड़ फेंका. हालांकि, नई सरकार तीन साल से भी कम वक़्त चली और अपने ही अंतर्विरोधों के चलते गिर गई. 1980 में इंदिरा गांधी और कांग्रेस की 'स्थायित्व' के नाम पर फिर सत्ता में वापसी हो गई. उनके चौथे कार्यकाल के पहले दो साल तो शांत ही रहे, लेकिन अचानक उनके सामने आंध्र में असंतोष, उत्तर-पूर्व में अलगाववाद और पंजाब में पूरे स्तर पर विद्रोह शुरू हो गया. उस वक़्त दावा किया गया था कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पंजाब में समस्या को और भड़काया था ताकि जब 1985 में चुनाव हों तो वह ख़ुद को ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश कर सकें जो भारत और अराजकता के बीच खड़ी हैं.

जून 1984 में उन्होंने सेना को स्वर्ण मंदिर में प्रवेश का आदेश दिया, जहां सिख चरमपंथियों का एक गुट छिपा हुआ था. इस कार्रवाई में 'आतंकवादी' तो मारे गए, लेकिन इसमें परिसर की दूसरी सबसे पवित्र इमारत को भी नुक़सान हुआ. पांच महीने बाद दो सिख सुरक्षा गार्डों ने बदला लेने की भावना से गोलियां मारकर इंदिरा गांधी की हत्या कर दी. इसमें संदेह नहीं कि वह पूरी तरह देशभक्त थीं, न ही इसमें कि उन्होंने 1971 के शरणार्थी संकट (जब पूर्वी पाकिस्तान से 90 लाख लोगों ने भारत में शरण ली थी) और उसके बाद की जंग में भारत का कुशलता से नेतृत्व किया. साठ के दशक के अंत तक भारत ने आत्मनिर्भर आर्थिक विकास पर ज़ोर देकर औद्योगिक क्षमता और प्रौद्योगिकी का एक आधार हासिल कर लिया था.

हालांकि, अर्थव्यवस्था को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के बजाय इंदिरा गांधी ने शिकंजा कसे रखा, जिसकी वजह से (जैसा की उम्मीद थी) कुल मिलाकर अक्षमता और भ्रष्टाचार ही बढ़ा. हालांकि अंततः 1991 में अर्थव्यवस्था का उदारीकरण हुआ, लेकिन दो दशक वैचारिक हठधर्मिता और निजी सुविधा की भेंट चढ़ गए. फिर भी महान देशभक्त, लेकिन बेहद दोषपूर्ण लोकतंत्रवादी- भारत की 1966 से 1977 और फिर 1980 से 1984 तक वे भारत की प्रधानमंत्री रहीं।  इंदिरा गांधी को इतिहास को ऐसे ही याद रखना चाहिए और देश और सरकारों को उन्हें इस प्रकार नजरअंदाज करने की जुर्रत नहीं करनी चाहिए।

- कल्याण कुमार सिन्हा